राजपूती कविता
तलवार हाथों से संभालती नहीं
सो,जीभ को तलवार बना लेते हैं
बंदूकें बन गयी हैं महफ़िलों की शोभा
गालियां देकर ही अपना काम चला लेते हैं ।
अब कहाँ हैं युद्ध के मैदान व
दुश्मनों की फौजें
सो,अपने भाई बंधुओं से ही जोर आजमा लेते हैं।
दिल तो करता है कि सिंह गर्जन करूँ
सीना तानकर
लेकिन मिलावट के इस दौर में फेफड़ों में
वो दम नहीं ।
फैशन की दुनियां में , बस स्टाइल
ही काफी है
शराब सिगरेट गाड़ी जरुरी है दूध
दही बॉडी नहीं।
खुद को 'सिंह' कहकर अपनी पीठ
थपथपा लेते हैं
'सिंह' सी शान चेहरे पर दमके,ख्यालातों में
वो गर्मी नहीं ।
बड़े ऊँचे आदर्श हैं कि 'राजपूत'
अकेला ही काफी है ,
हर तरफ से मारे जा रहे हैं मगर 'संगठित'
होना मंजूर नहीं ।।।।
कुँवर विरेन शेखावत
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