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राजपूती कविता

तलवार हाथों से संभालती नहीं सो,जीभ को तलवार बना लेते हैं बंदूकें बन गयी हैं महफ़िलों की शोभा गालियां देकर ही अपना काम चला लेते हैं । अब कहाँ हैं युद्ध के मैदान व दुश्मनों की ...